Thursday, January 20, 2011

ये देश कहाँ जा रहा हे,
महंगाई बढती  जा रही हे,
गरीब की थाली उसका मुंह चिढ़ा रही हे,
प्याज बिना काटे हि आंसू दिला रहा है,
शासन सिर्फ  आश्वासन दिए जा रहा है.
और हमे,
शिला की जवानी,
और मुन्नी की बदनामी डर सता रहा है,
ये देश कहाँ जा रहा है.....
ताबूत के दलालों को सज़ा नही, 
टू जी घोटाले का अता-पता नही,
अब बोफोर्स का जिन्न फिर से बाहर आ रहा हे,
और देश का प्रधान-मंत्री
जेपीसी जाँच से घबरा रहा है.
और हमें ,
शिला की जवानी........
अरुशी के गुनहगार कौन हे,
कोन बतायेगा?
जेसिका के हत्यारों को 
सजा कोन दिलाएगा?
महिला विरुद्ध अपराधो में
मंत्रियों का नाम आ रहा हे,
कानून अपने आप में बेबस नजर आ रहा है,
और हमे,
शिला की ..............
................इन्दर पाल सिंह ,"निडर"

Tuesday, January 4, 2011

हड़ताल

एरे-गेरे राजनीती की दुकान सजाये बैठे है,
जिसको देखो जहाँ-तहाँ पर जाम लगाये बैठे है.
आरक्षण के मुद्दे पर बंधक बन गया राजस्थान,
आना-जाना दूभर हो गया आमजन हुआ परेशान,
रेल-पटरियों पर देखो गुर्जेर टेंट गढाए बैठे है,
जिसको देखो जहाँ-तहाँ ..................
कॉलेज में गुट बने हुए है ऐसी पढाई होती है,
जब देखो लात और घूंसे बिन बात लढाई होती है,
अपना प्रभाव जमाने हेतु हड़ताल कराए बैठे है,
जिसको देखो जहाँ-तहाँ...............
आयकर की रेड पड़े तो व्यापारी कर दे हड़ताल,
मिलावट के सेम्पल लेना बन गया अब जी का जंजाल,
कही पे पुतले और कही पे टायर जलाये बैठे है,
जिसको देखो जहाँ-तहाँ..............

...........इन्दर पाल सिंह,"निडर"

Sunday, December 26, 2010

तेरे लिए

लिखूंगा तेरे चाँद से चेहरे पर,
जरा नजरो को चेहरे पे टिकाने तो दे,
लिखूंगा तेरे दिल की गहराई पर,
जरा दिल में अपने उतर जाने तो दे,
रच दूंगा में भी बच्चन सी मधुशाला,
जरा नयनो के मयखाने में जाते तो दे,
रच दूंगा कालिदास सा मेघदूत,
जरा अपनी जुल्फों को लहराने तो दे.
............इन्दर पल सिंह "निडर"

Thursday, December 23, 2010

मेरा श्रंगार रस

माना के श्रंगार-रस के कवि 

मुझे भाते है,
पर मुंशी और निराला
गरीब की याद दिलाते है...
माना कि तेरी पायल की,
झंकार मुझे भाती है,
पर गरीब की तस्वीर,
घायल कर जाती है...
माना की खूबसूरत है
तेरी आंखे,
पर मुझे याद आती है
गरीब की खाली आतें....
जब भी तेरी जुल्फें,
काली घटा सी लहराती है...
मुझे गरीब की कुटिया के,
अँधेरे की याद दिलाती है,
लिखने बैठा
तेरी नागिन सी  चोटी पर,
लिख बैठा
गरीब की रोटी पर,
चाँद अब तेरे चेहरे की
नही याद दिलाता है,
वो तो गरीब की खाली थाली का
अहसास कराता है,
माना कि हमने मिल कर
कुछ इरादे किये थे,
सब भूल गया जैसे,
सरकार ने गरीब से वादे किये थे....
.......... इन्दर पल सिंह "निडर"

Sunday, December 19, 2010

मेरी कविता


सत्ता की चापलूसी मुझको नही आती,
हुस्न की अदाएँ मुझको नही भाती,
देश के हालात से हैरान हूँ मै,
दिल्ली की ख़ामोशी से परेशान हूँ मै,
नहीं लिखूंगा पायल की झंकारो पर,
मैं बरसूँगा सत्ता के गलियारों पर,
लिखूंगा मै सीमा के जवान पर,
लिखूंगा मै हिमगिरी की शान पर,
नहीं लिखूंगा शीला की जवानी पर,
नही लिखूंगा मुन्नी की बदनामी पर,
मैं लिखूंगा "राजा' की बेईमानी पर,
लिखूंगा घोटालो की कहानी पर,
लिखूंगा मनमोहन की नादानी पर,
नहीं लिखूंगा गड्ढे वाले गालों पर,
लिखूंगा में नित नये घोटालों पर,
नहीं लिखूंगा बोलीवुड की शान पर,
मैं लिखूंगा भूखे हिंदुस्तान पर,
कैसे लिखूँ, पारो का क्या जलवा है,

मेरे लिए तो पारो एक अबला है,
बच्चन सी मधुशाला नही लिख पाउँगा,
मैं तो भूखे पेट का गाना गाऊंगा,
मैं लिखूंगा ड्रेगन के इरादों पर,
मैं लिखूंगा ओबामा के वादों पर,
नही भूलूंगा सीमा पर जवान को,
नही भूलूंगा कारगिल में बलिदान को,
लिखूंगा मन्दिर मस्जिद के नारों पर,
लिखूंगा फसादों में चीत्कारों पर,
बरसूँगा मै धर्म के ठेकेदारों पर,
लिखूंगा में साबरमती की आग पर,
लिखूंगा मोदी के उन्माद पर,
लिखूंगा में रामलला बेचारे पर,
लिखूंगा में अपने भाईचारे पर,
मेरे शब्दों में मजलूम की आवाज हो,
मेरे अंदर गुरुओं का प्रकाश हो,

मेरे अंदर "मुंशी" सा फ़ोलाद हो ,
मेरी कविता में सरस्वती का वास हो.... 
..............इंद्र पाल सिंह"निडर"

Thursday, December 16, 2010

शहीद का पैगाम

तेरी छाती का दूध पिया माँ,
उसको नही भुलाया हे,
पर धरती हम सब की माँ हे,
इसका कर्ज़ चुकाया हे,
शत्रु ने ललकारा था माँ,
सबक सिखा कर आया हूँ,
क्या हुआ जिन्दा नही लोटा
अमर हो कर आया हूँ,
क्या हुआ जिन्दा............
माना की तू ब्याहता मेरी,
मुझे प्राणों से प्यारी थी,
पर मात्रभूमि की रक्षा करना,
मेरी जिम्मेदारी थी,
सुहाग चिन्ह हे तुम्हे प्यार,
पर शहीद  की विधवा का 
सम्मान दिला कर आया हूँ,
क्या हुआ जिन्दा..........
स्कुल छोड़ने नही जाता तुमको,
दिल से मत लगाना तुम,
एक शहीद के बेटे हो
सोच-सोच इतराना तुम
तिरंगा तुमको कितना प्यारा,
उसे उढ़कर आया हूँ,
क्या हुआ जिन्दा ..........
प्यारी गुडिया सी बहना को

डोली में नही  बिठा पाया,
रक्षा-बंधन पर दिया वचन 
माना नही निभा पाया,
पर मात्र-भूमि की रक्षा  का 
वचन निभा कर आया हूँ,
क्या हुआ जिन्दा.......
तेरी ऊँगली पकड कर बड़ा हुआ में
अब कन्धा मुझे लगा देना,
देश-भक्ति की कहानियाँ 
मेरे बच्चो को भी  सुना देना,
तुमसे सुनी जो शोर्य कथाएं,
उन्हें दोहराकर आया हूँ,
क्या हुआ जिन्दा .............
घायल होकर भी लड़ता रहा में,
सांसो ने दगा दिया क्या करता?
तिरंगा उसपर लहराना था,
शहीद हो गयाक्या  करता?
लहर-लहर लहराए तिरंगा,
इसे खून चड़ा कर आया हूँ,
क्या हुआ जिन्दा नही लोटा,
अमर हो कर आया हूँ,
क्या हुआ जिन्दा..........
..........इन्दर पाल सिंह 'निडर'

Saturday, December 11, 2010

मुन्नी बनाम शीला

लपको पर किस्मत मेहरबान हो गयी,
मुन्नी बेचारी बदनाम हो गयी,
मुन्नी के चर्चे तो खत्म  हुए नही 
कि अब ये शीला भी जवान हो गयी.