एरे-गेरे राजनीती की दुकान सजाये बैठे है, जिसको देखो जहाँ-तहाँ पर जाम लगाये बैठे है. आरक्षण के मुद्दे पर बंधक बन गया राजस्थान, आना-जाना दूभर हो गया आमजन हुआ परेशान, रेल-पटरियों पर देखो गुर्जेर टेंट गढाए बैठे है, जिसको देखो जहाँ-तहाँ .................. कॉलेज में गुट बने हुए है ऐसी पढाई होती है, जब देखो लात और घूंसे बिन बात लढाई होती है, अपना प्रभाव जमाने हेतु हड़ताल कराए बैठे है, जिसको देखो जहाँ-तहाँ............... आयकर की रेड पड़े तो व्यापारी कर दे हड़ताल, मिलावट के सेम्पल लेना बन गया अब जी का जंजाल, कही पे पुतले और कही पे टायर जलाये बैठे है, जिसको देखो जहाँ-तहाँ..............
मुझे भाते है, पर मुंशी और निराला गरीब की याद दिलाते है... माना कि तेरी पायल की, झंकार मुझे भाती है, पर गरीब की तस्वीर, घायल कर जाती है... माना की खूबसूरत है तेरी आंखे, पर मुझे याद आती है गरीब की खाली आतें.... जब भी तेरी जुल्फें, काली घटा सी लहराती है... मुझे गरीब की कुटिया के, अँधेरे की याद दिलाती है, लिखने बैठा तेरी नागिन सी चोटी पर, लिख बैठा गरीब की रोटी पर, चाँद अब तेरे चेहरे की नही याद दिलाता है,
वो तो गरीब की खाली थाली का अहसास कराता है, माना कि हमने मिल कर कुछ इरादे किये थे, सब भूल गया जैसे, सरकार ने गरीब से वादे किये थे.... .......... इन्दर पल सिंह "निडर"
हुस्न की अदाएँ मुझको नही भाती,
देश के हालात से हैरान हूँ मै,
दिल्ली की ख़ामोशी से परेशान हूँ मै,
नहीं लिखूंगा पायल की झंकारो पर,
मैं बरसूँगा सत्ता के गलियारों पर,
लिखूंगा मै सीमा के जवान पर,
लिखूंगा मै हिमगिरी की शान पर,
नहीं लिखूंगा शीला की जवानी पर,
नही लिखूंगा मुन्नी की बदनामी पर,
मैं लिखूंगा "राजा' की बेईमानी पर,
लिखूंगा घोटालो की कहानी पर,
लिखूंगा मनमोहन की नादानी पर,
नहीं लिखूंगा गड्ढे वाले गालों पर,
लिखूंगा में नित नये घोटालों पर,
नहीं लिखूंगा बोलीवुड की शान पर,
मैं लिखूंगा भूखे हिंदुस्तान पर,
कैसे लिखूँ, पारो का क्या जलवा है, मेरे लिए तो पारो एक अबला है,
बच्चन सी मधुशाला नही लिख पाउँगा,
मैं तो भूखे पेट का गाना गाऊंगा,
मैं लिखूंगा ड्रेगन के इरादों पर,
मैं लिखूंगा ओबामा के वादों पर,
नही भूलूंगा सीमा पर जवान को,
नही भूलूंगा कारगिल में बलिदान को,
लिखूंगा मन्दिर मस्जिद के नारों पर,
लिखूंगा फसादों में चीत्कारों पर,
बरसूँगा मै धर्म के ठेकेदारों पर,
लिखूंगा में साबरमती की आग पर,
लिखूंगा मोदी के उन्माद पर,
लिखूंगा में रामलला बेचारे पर,
लिखूंगा में अपने भाईचारे पर,
मेरे शब्दों में मजलूम की आवाज हो,
मेरे अंदर गुरुओं का प्रकाश हो,
मेरे अंदर "मुंशी" सा फ़ोलाद हो ,
मेरी कविता में सरस्वती का वास हो....